अमेरिका में मंगलवार (3 नवंबर) को हुए मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने संसद (कांग्रेस) के दोनों सदनों, सीनेट और प्रतिनिधि सभा, पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। द हिंदू ने समाचार एजेंसियों के हवाले से बताया कि यह नतीजा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए बड़ा झटका है।

वैरायटी के मुताबिक, अमेरिकी चैनल सीएनएन ने भारतीय समय के अनुसार बुधवार सुबह करीब 10 बजे सीनेट डेमोक्रेट्स के नाम घोषित की, और अनुमान लगाया कि पार्टी ने 100 में से कम से कम 51 सीटें जीत ली हैं। कई सीटों पर गिनती बुधवार को भी जारी थी।

द हिंदू के अनुसार, मतदाताओं में अर्थव्यवस्था को संभालने के ट्रंप के तरीके और ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ने के उनके फैसले को लेकर नाराज़गी थी, जिससे ईंधन के दाम तेज़ी से बढ़े।

मिशिगन में इतिहास

बीबीसी हिन्दी के अनुसार, मिशिगन में डेमोक्रेट अब्दुल अल-सैयद ने रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स पर बढ़त बना ली, और समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (एपी) ने उन्हें विजेता बताया। करीब 85 फीसदी मतों की गिनती तक अल-सैयद को 52.0 फीसदी और रोजर्स को 46.2 फीसदी वोट मिले थे। अल-सैयद अमेरिकी सीनेट के लिए चुने जाने वाले पहले मुस्लिम होंगे।

द हिंदू के मुताबिक, अल-सैयद ने बुधवार तड़के डेट्रॉइट में समर्थकों से कहा कि मिशिगन ने यह कर दिखाया और उन्हें राज्य का सीनेटर-निर्वाचित होने पर गर्व है।

  • पेशे से डॉक्टर अल-सैयद ने पहले कभी कोई निर्वाचित पद नहीं संभाला।
  • उनका जन्म 1984 में डेट्रॉइट के पास रोचेस्टर हिल्स में हुआ। 2015 में वे डेट्रॉइट स्वास्थ्य विभाग के कार्यकारी निदेशक बने।
  • उन्होंने सबके लिए स्वास्थ्य सेवा और राजनीति से पैसे का असर खत्म करने जैसे वादों पर प्रचार किया।
  • वे सेवानिवृत्त हो रहे डेमोक्रेट सीनेटर गैरी पीटर्स की जगह लेंगे।

प्रचार के अंतिम दिनों में डेमोक्रेटिक प्राइमरी में उनसे हारीं सांसद हेली स्टीवंस ने रोजर्स का समर्थन कर दिया था। बीबीसी हिन्दी के मुताबिक, रिपब्लिकन पार्टी ने उन पर मिस्र के संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध रखने का आरोप भी लगाया, जिससे अल-सैयद इनकार करते हैं।

क्यों अहम है

दोनों सदनों पर डेमोक्रेट्स के कब्ज़े के बाद ट्रंप को अपने कार्यकाल के आखिरी दो साल विपक्ष के नियंत्रण वाली कांग्रेस के साथ काम करना होगा। इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, निवेशक नीतिगत गतिरोध की उम्मीद कर रहे हैं, जिससे सरकारी खर्च पर लगाम लग सकती है। बुधवार को दक्षिण कोरिया और ताइवान के शेयर बाज़ार गिरे, जबकि तेल की कीमतें नरम पड़ने से भारतीय सरकारी बॉन्ड में तेज़ी आई।