बांग्लादेश में न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर कपड़ा मज़दूरों के प्रदर्शन के कारण रविवार को देश की 529 फ़ैक्ट्रियों में काम ठप रहा, बीबीसी हिन्दी ने बीबीसी न्यूज़ बांग्ला के हवाले से बताया। क़रीब 9 लाख 87 हज़ार मज़दूरों ने उस दिन काम नहीं किया।
ये प्रदर्शन ढाका और उसके आसपास सावर, अशुलिया, मीरपुर और गाज़ीपुर जैसे औद्योगिक इलाक़ों में हो रहे हैं। तोड़फोड़, सड़क जाम और पुलिस से झड़प की घटनाएं भी सामने आईं, और पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े।
मज़दूर क्या चाहते हैं
मज़दूर न्यूनतम मासिक वेतन 12,500 टका (लगभग 8,800 रुपये) से बढ़ाकर 30,000 टका (लगभग 21,000 रुपये) करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि खाने-पीने, किराए, परिवहन और इलाज के बढ़ते ख़र्च ने उनकी ख़रीदने की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित किया है।
सरकार और मालिकों का पक्ष
श्रम एवं रोज़गार मंत्री आरिफ़ुल हक़ चौधरी ने रविवार को छह सदस्यों का वेतन बोर्ड बनाया और मज़दूरों से प्रदर्शन न करने की अपील की। कुछ मज़दूरों ने बीबीसी बांग्ला से कहा कि न्यूनतम वेतन की घोषणा होने तक आंदोलन जारी रहेगा।
प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान ने रविवार रात आपात बैठक की। गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने दावा किया कि कुछ नक़ाबपोश लोग आंदोलन में घुसकर अपने हित साध रहे हैं, और सीमा पार से उकसावे के ज़रिए निर्यात कारोबार को प्रभावित करने की कोशिश हो रही है।
श्रम मंत्री ने इसके पीछे अवामी लीग से जुड़े लोगों का हाथ होने का आरोप लगाया। बीबीसी के अनुसार, इन आरोपों पर अवामी लीग की कोई प्रतिक्रिया ज्ञात नहीं है।
कारोबारियों के संगठन बीकेएमईए के अध्यक्ष मोहम्मद हातेम ने कहा कि 30 हज़ार टका वेतन होने पर कई फ़ैक्ट्रियां बंद हो जाएंगी। उनका दावा है कि आंदोलन में असली मज़दूर शामिल नहीं हैं।
क्यों अहम है
कपड़ा उद्योग बांग्लादेश की निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। अल जज़ीरा के मुताबिक़, यह चीन के बाद दुनिया का सबसे बड़ा कपड़ा उद्योग है और देश की जीडीपी में क़रीब 10 प्रतिशत का योगदान देता है।
अल जज़ीरा के अनुसार, प्रदर्शन शनिवार को शुरू हुए थे और तब क़रीब 30 फ़ैक्ट्रियों ने छुट्टी घोषित की थी। एक दिन में यह संख्या 500 से ऊपर पहुंच गई।
पिछली बड़ी बढ़ोतरी नवंबर 2023 में हुई थी, जब न्यूनतम वेतन 56 प्रतिशत बढ़ाया गया था। अल जज़ीरा ने तब बताया था कि यह फ़ैसला एक दशक के सबसे बड़े वेतन आंदोलन के बाद आया और कुछ मज़दूर संगठनों ने इसे कम बताकर ख़ारिज कर दिया था।
आगे क्या
फ़ैक्ट्री मालिकों को आशंका है कि हालात नहीं सुधरे तो उत्पादन पर असर जारी रह सकता है। श्रम मंत्री ने चेतावनी दी कि लंबे समय तक फ़ैक्ट्रियां बंद रहने से निर्यात शिपमेंट और विदेशी ख़रीदारों के भुगतान में देरी हो सकती है। वेतन बोर्ड का फ़ैसला अब इस आंदोलन की दिशा तय करेगा।
